एक कमरा बंद इंसान हूं ।

This poem is the reflection of one’s thought that everyone of us go through. Before reading the poem let me paint you the context I wrote it in. Every person now and then confine himself or herself into a room where he/she feel safe.
In that room he fights a war within and emerges as winner.
Everyone of us is fighting a war, be it the loss of someone, heartbreak, failures or anything . Any big or small, a fight is a fight and every one fights it within himself. And then breaks the walls of that room and comes out as a victor.
Happy reading to you all ❤️
.

एक कमरा बन्द इंसान हूं
श्याइया पर लेटा शमशान हूं,
कितने मौसम समेट रखे हैं दिल में अपने
तूफान के बाद की शांति का सुनसान हूं,
एक कमरा बंद इंसान हूं।

धूप जो चोखट पर आती है
शाम को अंधेरा ढल जाने का इन्तजार हूं,
खुद के ही विचारों को तोड़ता मरोडता
एक खत्म होता युद्ध घमासान हूं,
बहुत अरसे से बाहर न निकला जो
एक कमरा बंद इंसान हूं ।

बाहर बारिश है शायद या शोर है अंदर
लहरें उठ तो रही हैं,
भीतर ना जाने कोन सा है समंदर
इतने शोर से बेखबर अनजान हूं,
लहरों से बच कर बैठा
एक कमरा बंद इंसान हूं ।

दस्तक होती है दरवाज़े पर या पेड़ों की टहनियां हैं
मन ही में बनाता और असली मानता,
नानी की कितनी कहानियां हैं ।
हर कहानी का एक ही विजेता
मैं ही विजयमान हूं,
एक कमरा बंद इंसान हूं।

अब निकलना पड़ेगा खुद के जाल से
बंद हूं एक चार दीवारी में,
ना जाने कितने साल से
बाहर की दुनिया से एक अरसे से
अनजान हूं,
एक कमरा बंद इंसान हूं ।

मैने बना ली थी दुनिया अपने हिसाब से
लिखता था मौसम को
और कहानियों को अपनी किताब में,
लेकिन एक कहानी जो अधूरी थी
अधूरी थी बिन संसार, प्यार, कुदरत और विज्ञान के,
इसी कहानी का अंतिम व्याखान हूं
एक कमरा बंद इंसान हूं ।

खुद की दुनिया के पिंजरों को जोड़ता
दुनिया की बनाई रीतों को तोड़ता,
पढ़ रहा है जो इसे इस समय
हर उस शक्स में विद्यमान हूं
तुम सब की तरह,
एक कमरा बंद इंसान हूं ।

26 thoughts on “एक कमरा बंद इंसान हूं ।

  1. लोग मुझे कैसे मिले
    ये कहानी में कैसे बताऊं
    गुजरा हुआ हर पल ज़िन्दगी के कोरे कागज़ पर
    बस लिखता चला जाऊं

    बहुत बढ़िया लिखा है भाई ❤️

    Liked by 1 person

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