असमंजस

कैसे रहते हो ?
अपने सपनों को घोट कर ,
उन्हें अधूरा छोड़ कर , कैसे रहते हो ?

सोते हो कैसे?
नींदों में अपनी उजाला लिए ,
ख्वाबों को अपने सांझा किए, सोते हो कैसे ?

रुक जाते हैैं कदम जिन राहों पर,
उन राहों पर जहां से रोज़ गुजरते हो ।
बड़ते हैं कदम जिनकी ओर
उनको खुद से दूर जो करते हो,
ऐसी दूरी को कैसे जी जाते हो ?
तुम अपने कदमों की कैसे रोक पाते हो ?

पेड़ों की छांव हैं आप
आपको कैसे काटें,
आपका प्यार तो जिदंगी है
उसी को कैसे बाटें।
उसी पेड़ की टहनियों को कैसे काटते हो ?
बिन छांव कैसे जी जाते हो ?

चांद गया, सवेरा हुआ – सूरज आया
एक आया ना तेरा खत,
इंतज़ार में जिसके सारी रातें तन्हा बिताते हो
नींद में तुम अपने दिल का हाल कैसे बताते हो ?

जो अधूरे से रह गए हैं
इश्क़, मंजिल या ख्वाब
उन्हें पूरा करने में क्यों कतराते हो,
एक खत ही तो है, तुम क्यों नहीं लिख पाते हो ?

एक रोटी का ही तो खेल है
इस खेल में हम कैसे हार जाते हैं ?
जिस दिन खा ले सुकून से
और जिस दिन ना मिले, नींद मैं क्यों बडबडाते हैं ?

सांस ही नहीं, वजूद भी चाहिए जीने के लिए
एहसास ही नहीं, मेहबूब भी चाहिए जीने के लिए
उसी कोशिश मैं खुद को क्यों हारा पाते हो ?
कोसते हो खुद को, खुद क्यों डांट जाते हो?
तुम बताओ मुझे खुद से कैसे जी पाते हो ?

18 thoughts on “असमंजस

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  Change )

Google photo

You are commenting using your Google account. Log Out /  Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  Change )

Connecting to %s