‘ मैं ‘

जब नहीं था कोई तब मैं ही था
जब नहीं रहेगा कोई तब भी मैं ही रहूंगा
क्यों मैं- को समझने में इतना वक्त लग जाता है
क्यों मैं- को अपनाने में वक़्त निकाल जाता है
मैं जानता हूं
मैं पहचानता हूं
मैं खुद में पूरा हूं
मैं हूं तो फिर क्यों मन से अधूरा हूं
क्यों हमेशा मैं ही उलझता हूं इशारों में
क्यों हमेशा मैं ही सुलगता हूं अंगारों में
मैं हूं तुम चिंता मत करो
मैं हूं तुम मुझसे मत डरो
तब भी सुन लेता हूं ताने दुनिया के मैं
तब भी झेल लेता हूं अफसाना दुनिया के मैं
मैं कभी हसा नहीं
मैं कभी रोया नहीं
ढूंढा कभी मैंने खुद को
मैं कभी खुद को मिला ही नहीं।
मुरझाया हुआ फूल भी खिल गया
मैं पतझड़ सा कभी खिला ही नहीं
स्वार्थी नहीं मैं
खुद से प्यार करने वाला हूं
मैं दूर हूं
मैं मजबूर हूं
बुरा नहीं किसी के लिए
बन्दा हूं खुदा का उसी का हूर हूं
रुकना है मुझे
मैं थक सा जाता हूं
जब भी भागता हूं दौड़ मैं
खुद को हारा सा पाता हूं
मैं हूं
मैं रहूंगा
मैं जीतूंगा
यही सोच के फिर खड़ा हो मैं दौड़ जाता हूं।